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स्क्रैप क्या होता है?

Scrap meaning in Hindi — कबाड़ की पूरी जानकारी, आसान भाषा में।

Metal Next Bazar टीम · 2015 से स्क्रैप बाज़ार का अनुभव · अपडेट: 28 अक्टूबर 2026

स्क्रैप (Scrap) यानी कबाड़ — वो सामान जो अपने असली काम का नहीं रहा, पर जिसके अंदर का धातु, कागज़ या प्लास्टिक दोबारा इस्तेमाल हो सकता है। पुरानी मोटर, टूटे बर्तन, बिजली के तार, फैक्ट्री की कतरन, पुरानी गाड़ी, अख़बार की रद्दी — सब स्क्रैप है। इसे छाँटकर, पिघलाकर या प्रोसेस करके नया माल बनता है, इसीलिए हर स्क्रैप की एक क़ीमत होती है और उसका रोज़ का भाव निकलता है।

स्क्रैप और कचरे में फ़र्क़

कचरा वो है जो फेंका जाता है और जिसकी कोई क़ीमत नहीं मिलती। स्क्रैप वो है जो बिकता है। एक टूटी स्टील की बाल्टी कचरा नहीं, लोहे का स्क्रैप है; बिजली का पुराना तार कचरा नहीं, तांबे का स्क्रैप है। फ़र्क़ बस इतना है कि उस चीज़ में बचा हुआ माल किसी के काम आता है या नहीं।

स्क्रैप के मुख्य प्रकार

प्रकारउदाहरणआख़िर में कहाँ जाता है
लोहा / स्टील (Ferrous)सरिया, गर्डर, गाड़ी की बॉडी, मशीन के पुर्ज़े, कास्ट आयरनस्टील प्लांट, फर्नेस, री-रोलिंग मिल
तांबा (Copper)बिजली के तार, मोटर वाइंडिंग, ट्रांसफ़ॉर्मर, AC की पाइपतार, केबल और कॉपर रॉड बनाने वाले
पीतल (Brass)नल, वॉल्व, सैनिटरी फिटिंग, पुराने बर्तनब्रास पार्ट्स उद्योग
एल्युमिनियमबर्तन, खिड़की के सेक्शन, कैन, इंजन के पुर्ज़े, तारएलॉय और कास्टिंग यूनिट
स्टेनलेस स्टीलबर्तन, किचन सिंक, फैक्ट्री के टैंकSS मेल्टिंग यूनिट
सीसा (Lead)पुरानी गाड़ी और इन्वर्टर की बैटरीअधिकृत बैटरी रीसाइक्लर
E-wasteमोबाइल, कंप्यूटर, सर्किट बोर्ड, पुराने उपकरणअधिकृत E-waste रीसाइक्लर
कागज़ / गत्ताअख़बार, कार्टन, ऑफ़िस पेपरपेपर मिल
प्लास्टिकबोतलें, डिब्बे, बाल्टी, पाइपप्लास्टिक रीसाइक्लिंग (दाना बनाने वाले)

Ferrous और Non-ferrous स्क्रैप क्या है

Ferrous स्क्रैप वो है जिसमें लोहा होता है — सरिया, चादर, कास्ट आयरन, मशीन के पुर्ज़े। इसकी पहचान आसान है: चुंबक चिपक जाता है। इसका भाव प्रति किलो कम होता है, पर मात्रा सबसे ज़्यादा होती है।

Non-ferrous स्क्रैप में लोहा नहीं होता — तांबा, पीतल, एल्युमिनियम, सीसा, जस्ता। इन पर चुंबक नहीं चिपकता और इनका भाव कई गुना ज़्यादा होता है। इसीलिए कबाड़ी भाई सबसे पहले चुंबक से माल अलग करते हैं। ध्यान रहे, स्टेनलेस स्टील के कुछ ग्रेड पर भी चुंबक कम या बिल्कुल नहीं चिपकता — उसे अलग पहचानना पड़ता है।

स्क्रैप का भाव कैसे तय होता है

  • अंतरराष्ट्रीय बाज़ार — तांबा और एल्युमिनियम का भाव लंदन मेटल एक्सचेंज (LME) और भारत में MCX से जुड़ा रहता है। वहाँ भाव हिला तो मंडी का भाव भी हिलता है।
  • मांग और सप्लाई — निर्माण का मौसम, फैक्ट्रियों की ख़रीद, त्योहार और बारिश तक असर डालते हैं।
  • शुद्धता और ग्रेड — साफ़, छँटा हुआ माल हमेशा ज़्यादा दाम पाता है। मिला-जुला माल सस्ता जाता है।
  • मात्रा और जगह — बड़ी मात्रा और मंडी के पास का माल बेहतर बिकता है, क्योंकि भाड़ा कम लगता है।
  • डॉलर-रुपया — आयात-निर्यात से जुड़े मेटल पर रुपये की क़ीमत का भी असर पड़ता है।

इन्हीं वजहों से भाव रोज़ और कई बार घंटे-घंटे पर बदलता है। ताज़ा भाव के लिए National Rate देखिए।

स्क्रैप की चेन — घर से फैक्ट्री तक

  1. घर, दुकान, फैक्ट्री — जहाँ से स्क्रैप निकलता है।
  2. फेरीवाला / छोटा कबाड़ी — गली-मोहल्ले से माल इकट्ठा करता है।
  3. बड़ा कबाड़ी / गोदाम — मात्रा जमा करता है और माल को ग्रेड के हिसाब से छाँटता है।
  4. ट्रेडर / होलसेलर — ट्रक के हिसाब से माल मिलों तक पहुँचाता है।
  5. रीसाइक्लिंग यूनिट / मिल — पिघलाकर या प्रोसेस करके नया कच्चा माल बनाती है।

हर कड़ी अपना मुनाफ़ा जोड़ती है। यही चेन स्क्रैप बिज़नेस है — और इनमें से किसी भी कड़ी से काम शुरू किया जा सकता है।

स्क्रैप क्यों ज़रूरी है

स्क्रैप से धातु दोबारा बनाने में खदान से नई धातु निकालने के मुक़ाबले बहुत कम ऊर्जा लगती है — एल्युमिनियम में यह बचत लगभग 95% तक मानी जाती है। इससे खनन कम होता है, प्रदूषण घटता है, और लाखों लोगों को रोज़गार मिलता है। यानी कबाड़ का काम कमाई के साथ देश और पर्यावरण का भी काम है।

स्क्रैप से जुड़े आम शब्द

  • कबाड़ी — स्क्रैप ख़रीदने-बेचने वाला व्यापारी।
  • HMS — Heavy Melting Scrap, यानी पिघलाने लायक मोटा लोहा।
  • कतरन — फैक्ट्री में चादर काटने से निकले टुकड़े।
  • बुरादा (Turnings) — मशीन पर धातु छीलने से निकला बारीक माल।
  • ढलाई (Casting) — साँचे में ढला हुआ माल, जैसे इंजन ब्लॉक या मशीन की बॉडी।
  • ग्रेडिंग — माल को किस्म और शुद्धता के हिसाब से अलग करना।
  • LME / MCX — धातुओं के अंतरराष्ट्रीय और भारतीय एक्सचेंज, जहाँ से भाव की दिशा मिलती है।

अब अगला क़दम: स्क्रैप बिज़नेस कैसे शुरू करें — पूरी गाइड पढ़िए।

❓ सवाल-जवाब

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

स्क्रैप को हिंदी में क्या कहते हैं?+
स्क्रैप को हिंदी में कबाड़ कहते हैं। कागज़ वाले कबाड़ को रद्दी और लोहे वाले को भंगार भी कहा जाता है। मतलब एक ही है — पुराना माल जो दोबारा इस्तेमाल के लिए बिकता है।
सबसे महँगा स्क्रैप कौन-सा होता है?+
रोज़मर्रा के कबाड़ में आमतौर पर तांबा (Copper) सबसे महँगा होता है, उसके बाद पीतल और एल्युमिनियम। लोहा प्रति किलो सस्ता होता है, पर उसकी मात्रा सबसे ज़्यादा होती है।
1 किलो लोहे का कबाड़ कितने का बिकता है?+
लोहे का भाव रोज़ बदलता है और शहर, ग्रेड और मात्रा पर निर्भर करता है। मोटा, साफ़ लोहा पतले और जंग लगे माल से ज़्यादा दाम पाता है। आज का भाव जानने के लिए National Rate या WhatsApp Live Rate सेवा देखिए।
Ferrous और Non-ferrous स्क्रैप में क्या फ़र्क़ है?+
Ferrous में लोहा होता है और उस पर चुंबक चिपकता है। Non-ferrous में लोहा नहीं होता — तांबा, पीतल, एल्युमिनियम — इन पर चुंबक नहीं चिपकता और इनका भाव ज़्यादा होता है।
क्या E-waste और पुरानी बैटरी किसी भी कबाड़ी को बेच सकते हैं?+
E-waste और पुरानी बैटरी के लिए अलग सरकारी नियम हैं (E-Waste Management Rules 2022 और Battery Waste Management Rules 2022)। इन्हें अधिकृत रीसाइक्लर या उनके कलेक्शन सेंटर तक ही पहुँचना चाहिए।
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